कुछ भी नहीं

******कुछ भी नहीं******

तुम खुद को ना पूछो तो बहुत कुछ,  पूछो तो तुम कुछ भी नहीं,
ये दुनिया एक डोंग करती है, इससे ज्यादा ये कुछ भी नहीं।

हाँ, माना कि गलतियां हम सब ने की हैं,
मगर हम माफी मांगे तो,”मसला” कुछ भी नही।

ये इश्क,प्यार, मुहब्बत  सब एक दिखावा है,
जो भूखा हो एक अरसे से “चांद”, एक रोटी के सिवा कुछ भी नहीं।

जो हार गया हो  खुद से खुद की जिद में,
किसी और से हारना तो कुछ  भी नहीं।

हम सबके अंदर एक हमसे बेहतर इंसान रहता है,
खुद से बातें करें, तो अकेलापन कुछ भी नहीं।

इस ज़िन्दगी की खुद में भी एक अपनी ज़िन्दगी है,
तुम उसकी लाचारी देखो तो, हमारी लाचारी तो कुछ भी नहीं।

खुदखुशी एक जरिया है, हारे हुए लोगों दुनिया से निकालने का,
मौत आसान है तो जिंदगी की मुश्किलें तो कुछ भी नहीं।।
***आशीष रसीला***

ज़िन्दगी में दौड़ लगी है

ज़िन्दगी की सच्चाई
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दुनियां में दौड़ लगी है, मगर जाना कहां है?
किसी को  पता नहीं,
एक उम्र बीती है दौलत कमाने में, मगर खर्च करने बैठे हैं,
तो आज उम्र नहीं।
घर बनाने के लिए बेघर रहा ज़िन्दगी भर, जब आज घर मिला ,
तो परिवार नहीं।
उम्र के दरिचे से आख़िर सांस लेते हुए सोचता हूं, कि  जिदंगी  जिया भी हूं ?
सच कहूं तो मालूम नहीं।।
***आशीष रसीला***

मैं बन्द आंखो का

मैं बन्द आंखो का एक बुझा उजाला बन गया हूं,
मैं मौत के मीठे जहर का एक प्याला बन गया हूं।
अय ख़ुदा मुझे मेरी मंजिल का पता  बता दे तू ?
मैं आज तूफान से हवा का झूठा हवाला बन गया हूं।।

***आशीष रसीला**

कोरोना के महायोद्धा

कोरोना के महायोद्धा —-

कोई पूछे मुझसे, की क्या तुमने खुदा को देखा है ?
मैं कहूंगा, कि मैंने नहीं देखा ख़ुदा को मगर, मैंने कुछ ख़ुदा सा देखा है।
हां शायद  मैंने ख़ुदा को देखा है।

जब विश्व कैद था घर की चार दिवारी में,
दुनिया में मौत का कहर बरसाया चाईना कि करोना महामारी ने।
मैंने मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर को बंद होकर मौत का तमाशा देखते देखा है,
तब उस वक्त मैंने पुलिस, डॉक्टर सफाईकर्मी को मौत से दुनियां को बचाते देखा है।
हां शायद मैं कहूंगा आज की मैंने ख़ुदा को देखा है,

हम सो जाते थे रात को कम्बल ओढ़कर,
मां – बाप अपने बच्चों को अपने सीने से लपेटकर।
मैंने डॉक्टर, पुलिस,सफाईकर्मी के बच्चों को अपने मां बाप के लिए तड़पते देखा है,
हां मैंने बलिदानी की राह में उनके बच्चों को अकेले सोते देखा है।
हां मैंने ख़ुदा को देखा है, हां मैंने ख़ुदा को देखा है।

करोना जब घुस गया विश्व के हर कोने – कोने में,
तब दुनिया पागल हुई थी मौत के डर से रोने में।
मैंने तब डॉक्टर, पुलिस, सफाईकर्मी को दुनियां का हाथ थामते देखा है,
हां मैंने ख़ुदा को मौत के पहरे पर खड़ा देखा है,
हां मैंने ख़ुदा को देखा है, हां मैंने ख़ुदा को देखा है।

नींद, आराम चैन सब त्याग उन्होंने विश्व अपने हाथों में लिया,
पूरी दुनिया को आराम से सोने दिया मगर खुद को जगने दिया।
मैंने ऐसे ही कुछ सूरज को धरती पर चमकते देखा है,
हां मैंने दुनिया की इस भीड़ में ख़ुदा को हमारे बीच ही देखा है,
हां मैंने ख़ुदा को देखा है, हां मैंने ख़ुदा को देखा है।

ये कर्ज है उनका इस पूरे विश्व पर,
जिन्होंने जीत पाई है करोना जैसी माहामारी पर,
हां मैंने उन योद्धाओं को करोना से लड़ते देखा है,
हां मैंने ख़ुदा को मानव जाति के लिए मौत से लड़ते देखा है।
हां मैंने ख़ुदा को देखा है, हां मैंने ख़ुदा को देखा है।

पूरे विश्व  में जिन्होंने मानव जाति को बनाए रखा,
मौत के सामने खड़े होकर मौत से सीना लगाए रखा,
मैं नमन करता हूं विश्व के तमाम डॉक्टर, पुलिस, सफाईकर्मी को,
जिन्होंने हमारी जान के खातिर अपनी जान गवाई है,
अपनी जान हथेली पर रखकर जिन्होंने विश्व को राह दिखाई है।
मैंने मौत को ख़ुद जिनके कदमों में झुकते देखा है।
हां मैंने ख़ुदा के नाम को पुलिस, डॉक्टर, सफाईकर्मी स्थान पर देखा है,
हां मैंने ख़ुदा को देखा है, हां मैंने ख़ुदा को देखा है।।
Name- Ashish Rasila

मैंने कुछ गलतियां

अर्ज़ किया है,
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मैंने कुछ गलतियां कि है मगर, तुम मुझे गलत मत कहो,
मैं थोड़ा नादान हूं जरूर  मगर, तुम मुझे पागल मत कहो।
माना कि इश्क़ करने का सलीका, मुझको नहीं आता,
  अभी मुझे मुहब्बत नहीं हुई है, तुम मुझे बेवफ़ा मत कहो।।
***आशीष रसीला***

सुर्ख निगाहें

सुर्ख निगाहें होठों पर जैसे कोई गुलाब रखा हो,
वो सूरज का नूर जैसे अंधेरे में कोई दीप रखा हो।
उसकी तारीफ में मेरा हर लफ्ज़ तौहीन लगता है,
उसको देखे तो जैसे आईना संवर कर आईने के सामने रखा हो।।***आशीष रसीला***

बचपन में रहने दो

अभी वक्त है, तुम इनके हाथों में खिलौने रहने दो,
सूरज को चाचा  और चांद को मामा रहने दो।
ये किताबों कि भाषा अच्छी है मगर,
ये बच्चे है इनको बचपन में रहने दो।
अभी नाजुक पंखों पर भारी सपने मत रखो,
ये खुद ही उड़ जायेंगे मगर उड़ना सीखने दो।
***आशीष रसीला***

बाज़ार जिस्मों का

यहां बाज़ार जिस्मों का लगा है,
आप सौदा रूह का करने निकले हो।
ये लोग ज़मीर बेच कर बैठे है
तुम ज़मीर खरीदने निकले हो।।

***आशीष रसीला**

ख़ुद पर सवाल

कभी खुद के होने पर भी सवाल किया करो,
उन सवालों के जवाब खुद ही दिया करो।

तुझे मालूम नहीं तेरे अंदर भी एक इंसान रहता है ?
वक्त निकाल कर उससे गुफ्तगु किया करो।

तुम खास हो या आम क्या फ़र्क पड़ता है ?
ज़िन्दगी को  अपने असुलों से जिया करो।
***आशीष रसीला***

अजीब आदमी

अब खुद का खुद में दिल नहीं लगता ,
ज़िन्दगी मुश्किल है मगर, मरना भी आसान नहीं लगता।

सब लतीफे पढ़ चुका हूं मैं,
के वो बच्चा अब मुझ में नहीं हंसता।

दिल भर गया है  हर चीज से मेरा,
कुछ भी करने का दिल नहीं करता।

मैं कुछ ना करके भी थक जाता हूं,
कोई मीलों चल कर भी नहीं थकता।

मैं शायद एक अजीब सा  इंसान हूं,
जो सोया रहता है कोई काम नहीं करता।

सच कहूं तो धरती पर बोझ सा बन गया हूं,
मेरे होने या ना होने से किसी को फ़र्क नहीं पड़ता।

मैं हर रोज सपने बुनता हूं बिस्तर पर,
मगर सुबह कुछ करने को मेरा कदम नहीं बड़ता।

मैं सच कहूं तो बहुत कुछ करना चाहता हूं,
मगर क्या करना है मुझे ये मामुल नहीं पड़ता।

मैं दिल का साफ हूं  और सबकी कद्र करता हूं,
हां वो अलग बात है कि मेरी कद्र कोई नहीं करता।

मैं गुनेहगार हूं अपने मां – बाबा का,
मुझे लगता है कि मैं अच्छा बेटा भी नहीं बन सकता।

सच कहूं तो मैं सच में बहुत बुरा हूं,
खुद में खोया रहता हूं अपनों का ख्याल भी नहीं रखता।

मैं सोचने में ही सारा वक़्त निकाल देता हूं,
मैं कोई भी काम वक़्त पर नहीं करता।

मुझको ले कर सबको शिकायते है,
मगर मैं किसी से कोई शिकायत नहीं करता।

वो मुझे नाकारा, काम चोर कुछ भी कह देते है,
मैं अब खुद की इज्जत भी नहीं करता।

ऐसा लगता है कि जैसे मैं अकेला सा पड़ गया,
दुनिया में भीड़ बहुत मगर मुझे कोई प्यार नहीं करता।

***आशीष रसीला***