गणतंत्र दिवस

ऐ हिन्द- ए – ज़मीं मर कर भी हम तुझको ही गले लगाएंगे,
मौत जब आवाज देगी तेरी गोद में ही सर रख सो जाएंगे ।

तू फ़िक्र ना कर तेरे पास रहेंगे तेरी ख़ाक में मिल जाएंगे,
ख़ुशबू बन फूलों में खिलेंगे , खाद बन फसलों में लहराएंगे।

ऐ वतन तेरे शान खातिर सौ जन्म भी कम लगे,
तेरे इश्क़ में पागल हम शहीद जवान फिर से वापिस आयेंगे ।

मौत का हमें डर नहीं जीने की आरज़ू तेरे साथ ,
एक ख़्वाब हमसब ने देखा, हम तिरंगे में लिपटकर आयेंगे ।

भारत तेरी आज़ादी के खातिर जिन वीरों का ख़ून बहा,
गणतंत्र दिवस के मौके पर हम उनकी गाथा गायेंगे ।

ऐ वतन तेरी शान ऊंची, तिरंगा ऊंचा लहराएंगे ,
भारत तू स्वतंत्र है , हम गणतंत्र दिवस मनाएंगे ।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

नज़्म जवां हुई

नज़्म जवां हुई, आज लिखने में ग़ज़ल सी लगी,
चांद एक सुंदर लड़की, रात सांवली औरत सी लगी।

चांद महफ़िल में ‘उमराव  जान’ बनकर बैठा है,
मुझको ये सूरज को पटाने कि तरकीबें लगी ।

मेरी एक ग़ज़ल मुझे मुस्कुरा कर देखती  है,
मुझे उस की तबियत कुछ ठीक नहीं लगी।

कल सुबह सूरज देर से निकला  था ,
मुझे इसमें कोई शरारत चांद की लगी ।

आख़िर तूने मुस्कुरा कर देख ही लिया ज़िदंगी,
सच कहूं तो तेरी मुस्कुराहट मुझे अच्छी लगी ।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

किताबें

किताबें……!
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ये ऐसी ख़ुशबू ,जो कहीं ओर से ना आए ,
ये वो ख़ुशबू ,जो सिर्फ किताबों से आए।

कुछ ऐसी बातें, जो किसी और को ना बताए,
जो उसके करीब हो, वो सिर्फ उसको बताए ।

तुम हाथ मिलाओ, तो वो बाहें फैलाए,
अगर किताबें हो दोस्त, कोई दिल तोड़ कर दिखाए ?

ये ऐसी मुहब्बत, जी भरने को ना आए ,
उसकी ऐसी दोस्ती, दुनिया देखती रह जाए।

उसके ऐसे मशवरे, कभी हंसाए तो कभी रुलाए ,
दुनियां के हर दर्द का, जब वो इलाज बताए ।

जब बिखरे पन्ने, तब वो  जुल्फ़ें सजाए ,
अगर कोई सादा दिल देखे , तो प्यार हो जाए।

खुदा करे, ये  गुनाह  कभी मुझ से ना हो जाए ,
जान निकल जाती है, वो हाथ से जब झूट जाए।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

डर लगता है

मैं चिराग़ हूं  तेरे आशियाने का ,
हवा जो चले, तो डर लगता है ।

मैं एक पत्ता तेरे आंगन के दरख़्त का ,
पतझड़ जो आए, तो डर लगता है ।

मैं सिमटा हूआ तेरे बदन की ख़ुशबू में ,
कोई और जो छुए, तो डर लगता है ।

मैं याद हूं तेरे गुजरे ज़माने की ,
तू कहीं भूल ना जाए, तो डर लगता है।

मैं अब भी तेरे दिल में रहता हूं ,
यहां कोई और ना आ जाए,तो डर लगता है ।

तू रूठी है मुझ से कुछ दिनों से,
तू कभी वापिस ना आए, तो डर लगता है ।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

वो बारिशों में

वो बारिशों में भीगती बहुत है ,
मेरी आंखे रातभर बरसती बहुत हैं ।
मैंने एक अरसे से ख़्वाब नहीं देखे ,
मेरी आंखे रातभर जागती बहुत हैं ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

आंखों पर चश्मा

वो आंखों पर चश्मा नाक पर गुस्सा रखती है ,
वो घटाओं सी बरसे जब लहरा कर चलती है ।

वो जिन्दा दिल है , वो हसीनाओं में हंसी ,
क़यामत लगती है जब मुस्कुरा कर मिलती है ।

वो खुद में एक करिश्मा जिसके होने पर ताज्जुब हो ,
वो दुनिया कि तारिकी में सूरज की रोशनी सी चमकती है ।

वो घूमने की शौकीन उसे वादियों से मुहब्बत है ,
वो आंखे बंद करे  तो शाम सी ढलती है ।

उसको कुदरत से मुहब्बत , बच्चे बहुत प्यारे हैं ,
उसको सोते देखो तो मासूम बच्ची सी लगती है।

वो तूफानों में पली वो हौसलों से उड़ती है ,
उसे किस्मत से ना कोई गिला,वो किस्मत खुद लिखती है ।

बातें ऐसी की उड़ते परिंदों को नसीहत मिले,
सीने में गुबार है मगर दोस्ती का मतलब समझती है।

उसकी दुश्मनी भी अच्छी है दोस्ती क्या कहिये ?
मिजाज नाजुक हैं उसके मगर अपनों पर मरती है ।

वो पाक रूह है दिल में उसका कुनबा रहता है,
वो अब्बा कि सहजादी सब पर हुकुमत करती है ।

कोई पूछेगा नहीं कि कौन है वो कहां रहती है ?
मेरी हक़ीक़त थी वो, अब मेरे ख़्वाब में रहती है।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

अच्छा लगा

झुका जब सर उसके कदमों में, तो झुकना अच्छा लगा ,
गुनाह कबूल कर रूह का यूं  तड़पना अच्छा लगा ।

अब उसकी मर्ज़ी वो हमको माफ करे या सुली चढ़ाए ,
मगर माफ़ी मांग कर दिल हल्का हुआ तो अच्छा लगा ।

इश्क़ की राह में हम  खुद ही  बेवफा बन बैठें हैं ,
अब मुहब्बत का मतलब समझ आया तो अच्छा लगा ।

उसने बात भी कि, मगर एक ग़ैर की तरह ,
उसका यूं बेरूख़ी से पेश आना भी अच्छा लगा ।

उसको कहा था कि तुमसे कभी बात ना करेंगे,
मगर आज उनसे बात करके हमको अच्छा लगा।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

मनाली

कोह बर्फ की चादर ओढ़े, सफ़ेद बगुलों सा बैठा है ,
मनाली सर्दी कि वादीयों में सफेद रजाई ओढ़े बैठा है।

कुछ सोतें हैं सिड्डू – फेमडे की की चुस्की ले कर
अभी आधा मनाली तंदूर की गरमी के सामने बैठा है ।

कोई आए मनाली, घी बाड़ी ओर छिल्डा ना खाए ,
मुमकिन है वो जरूर किसी ओर मनाली में बैठा है ।

पुराने घरों की तराशी में लिपटा हुआ है आज भी पूर्वज,
वहां कि मिट्टी की ख़ुशबू में  असली मनाली बैठा है।

जला देती है बर्फीली हवाएं चेहरों की रंगत को
प्रवासी ठिठुरता हुआ बर्फ की गोद में बैठा है ।

चीर कर पत्थरों को नदी एक तरज में बहती है ,
पहाड़ों का गरूर नदी के किसी कोने में बैठा है ।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

उदास बैठे हो

उदास बैठे हो , तो कुछ बात करके देखूं ,
बातें चुभती हैं बहुत, फिर खामोश रह कर देखू ।

हवा से तेरे चिरागों की लौ डगमगा जाती है,
तुम कहो तो आज हवा से झगड़ कर देखूं

उसने दिया बुझा कर देखा कि अंधेरा कितना है ,
अब रोशनी के लिए मैं खुद को जला कर देखूं ।

सात संदूकों में इस परिंदे के सपने कैद हैं ,
तुम होंसलों से उड़ो तो आजाद कर के देखूं ।

ये खुवाईशों का कत्ल है सजा जिंदगी देगी,
इजाज़त हो तो तुम्हारे मुकदमें की पैरवी कर के देखूं ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila