ना जाने वो कैसी दिखती होगी ?

उफ़ुक़ के उस पार  वो जरूर कहीं रहती होगी,
ख़ुदा जाने या वो जाने, ना जाने कैसी दिखती होगी ?

मैं अक्सर  सोचता रहता हूं फकत उसके बारे में,
वो सूरज की किरण या रात सांवली सी दिखती होगी ।

मुझे मालूम है उसके भी होंगे बहुत  चाहने वाले,
मुनासिफ है उसकी नजर भी किसी पर टिकती होगी।

ये बेख्याल सा ख्याल सिर्फ मुझको ही आता है क्या ?
या वो भी मुझसे मिलने के लिए अक्सर सोचती होगी ?

मैं तेरी तलाश में जरूर निकलूंगा एक दिन,
यकीनन तुझसे मिलकर जिंदगी, जिदंगी सी लगती होगी।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

मैं सिर्फ एक फ़साना था,तेरे अफसानों में

मैं सिर्फ एक  फ़साना था, तेरे अफसानों में,
मैं सिर्फ के बहाना था, तेरे कई बहानों में।

मैं  तेरा एक जाम था, खुदको महखाना समझ बैठा,
मैं भी बस एक चाहने वाला था, तेरे कई चाहने वालों में।

मैं जिदंगी का हिस्सा था, खुदको जिंदगी समझता रहा,
एक उम्र बीती है मेरी, खुद को ये बात समझाने में।

अब जब-तक जिऊंगा, खुद के साथ रहूंगा मैं,
एक  अरसा लगा है मुझे, खुद के पास आने में ।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

मेरी तहरीर मिट नहीं सकती

मेरी तहरीर मिट नहीं सकती फकत उनके कहने से,
गोया समंदर का गुमार नहीं  जाता, नदियों के जाने से।

वो बेशक मेरे इत्लाफ़ में जशन करें बहुत,
अबस है सारे इल्ज़ाम, खुदी मिटती नहीं यूं मिटाने से।

मैं फ़िगार में  हूं, मुझे  पशेमान मत समझ,
कुछ अश्क महमान थे मेरे, ग्रद के आंखों में जाने से।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

वजह ढूंढ लो

गम के समंदर में एक  बूंद खुशी की ढूंढ़ लो,
जिदंगी अच्छी लगेगी, अगर जीने की वजह ढूंढ लो।

दस्तूर – ए – दुनियां बहुत हंसेगी तेरे बुरे हालों पर,
तुम अभी से बुरे हालों में, मुस्कुराने की वजह ढूंढ लो।

अंधेरा छोड़ो, तेरा साया भी कल तुझे रह – रह कर  डरायेगा,
तुम अपनी आंखें बंद करो, अंधेरे में रोशनी ढूंढ़ लो।

राज क्या है  समंदर का, तुम खुद ही जान जाओगे,
अगर डुबकी लगा कर  गहराई में कुछ मोती ढूंढ लो ।

दुनियां घूम लो, मगर कोई बेहतर शख्स ना मिलेगा,
उसे ढूंढ सकते हो  तो अपने अंदर ढूंढ लो ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

अपने हुनर की परवरिश करो

दुनियां में हर दौर के बाद, एक दौर चलता है,
जहां आप नहीं चल सके वहां कोई और चलता है ।

तुम खास हो या आम, एक दिन खुद ही जान जाओगे,
जहां तलवार नहीं चलती, वहां सुई से काम चलता है।

अगर खुद में कुछ हुनर है, तो उसकी परवरिश करो,
इरादे हो बुलन्द तो आंधियों में भी चिराग जलता है।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

खामशियां कुछ कहती है

सुनो ज़रा खामोश होकर, ये ख़ामोशियां कुछ कहती हैं,
शायद वो इंसानियत है, जो हम सब में हमेशा रहती है।

ये गुनाहों का सिलसिला मजबूरियों से चलता है,
मां से पूछना, हर  दरिंदे में मासूमियत रहती है।

मैंने देखा है लोगों को खुद की गलतियों से घुटते हुए,
माफ़ी  मांगो तो, गुनाह कम होने की गुंजाइश रहती है।

माना के नफरतों का जहर भर रहा है दुनिया में,
तुम शुरुवात करो, तो एक दुनियां हम सब में रहती है।

मुहब्बत का दस्तूर सिर्फ महबूब तक मत रखो,
जिदंगी भर मुहब्बत सिर्फ मां -, बाप के दिल में  रहती है।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

गुनाह जिस्म ने किया

गुनाह जिस्म ने किया, सजा रूह को मिली,
एक बादल दिल में उठा, आंखें बरसने लगी।

  थकावट जिस्म में थी, आंखें रात भर टपकती रही।
नींद साथ लेटी रही , मगर मेरी आंख ना लगी।

  बुरीदा सर गया, अब सजदा किसका करूं,
एक गुबार था सीने में, जिसकी हवा बन चली।

  लज्जा कहते हैं, बे – अदब को आती नहीं,
कल उठ कर देखा, तो आईने पर मेरी आंख ना टिकी।

कुछ भी नहीं था पहले, जो था वो भी ख़ाक हो गया,
या मौला ये कैसी दुआ हैं, जो मुझे बद्दुआ सी लगी।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila