आंखों पर चश्मा

वो आंखों पर चश्मा नाक पर गुस्सा रखती है ,
वो घटाओं सी बरसे जब लहरा कर चलती है ।

वो जिन्दा दिल है , वो हसीनाओं में हंसी ,
क़यामत लगती है जब मुस्कुरा कर मिलती है ।

वो खुद में एक करिश्मा जिसके होने पर ताज्जुब हो ,
वो दुनिया कि तारिकी में सूरज की रोशनी सी चमकती है ।

वो घूमने की शौकीन उसे वादियों से मुहब्बत है ,
वो आंखे बंद करे  तो शाम सी ढलती है ।

उसको कुदरत से मुहब्बत , बच्चे बहुत प्यारे हैं ,
उसको सोते देखो तो मासूम बच्ची सी लगती है।

वो तूफानों में पली वो हौसलों से उड़ती है ,
उसे किस्मत से ना कोई गिला,वो किस्मत खुद लिखती है ।

बातें ऐसी की उड़ते परिंदों को नसीहत मिले,
सीने में गुबार है मगर दोस्ती का मतलब समझती है।

उसकी दुश्मनी भी अच्छी है दोस्ती क्या कहिये ?
मिजाज नाजुक हैं उसके मगर अपनों पर मरती है ।

वो पाक रूह है दिल में उसका कुनबा रहता है,
वो अब्बा कि सहजादी सब पर हुकुमत करती है ।

कोई पूछेगा नहीं कि कौन है वो कहां रहती है ?
मेरी हक़ीक़त थी वो, अब मेरे ख़्वाब में रहती है।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

अच्छा लगा

झुका जब सर उसके कदमों में, तो झुकना अच्छा लगा ,
गुनाह कबूल कर रूह का यूं  तड़पना अच्छा लगा ।

अब उसकी मर्ज़ी वो हमको माफ करे या सुली चढ़ाए ,
मगर माफ़ी मांग कर दिल हल्का हुआ तो अच्छा लगा ।

इश्क़ की राह में हम  खुद ही  बेवफा बन बैठें हैं ,
अब मुहब्बत का मतलब समझ आया तो अच्छा लगा ।

उसने बात भी कि, मगर एक ग़ैर की तरह ,
उसका यूं बेरूख़ी से पेश आना भी अच्छा लगा ।

उसको कहा था कि तुमसे कभी बात ना करेंगे,
मगर आज उनसे बात करके हमको अच्छा लगा।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

मनाली

कोह बर्फ की चादर ओढ़े, सफ़ेद बगुलों सा बैठा है ,
मनाली सर्दी कि वादीयों में सफेद रजाई ओढ़े बैठा है।

कुछ सोतें हैं सिड्डू – फेमडे की की चुस्की ले कर
अभी आधा मनाली तंदूर की गरमी के सामने बैठा है ।

कोई आए मनाली, घी बाड़ी ओर छिल्डा ना खाए ,
मुमकिन है वो जरूर किसी ओर मनाली में बैठा है ।

पुराने घरों की तराशी में लिपटा हुआ है आज भी पूर्वज,
वहां कि मिट्टी की ख़ुशबू में  असली मनाली बैठा है।

जला देती है बर्फीली हवाएं चेहरों की रंगत को
प्रवासी ठिठुरता हुआ बर्फ की गोद में बैठा है ।

चीर कर पत्थरों को नदी एक तरज में बहती है ,
पहाड़ों का गरूर नदी के किसी कोने में बैठा है ।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

उदास बैठे हो

उदास बैठे हो , तो कुछ बात करके देखूं ,
बातें चुभती हैं बहुत, फिर खामोश रह कर देखू ।

हवा से तेरे चिरागों की लौ डगमगा जाती है,
तुम कहो तो आज हवा से झगड़ कर देखूं

उसने दिया बुझा कर देखा कि अंधेरा कितना है ,
अब रोशनी के लिए मैं खुद को जला कर देखूं ।

सात संदूकों में इस परिंदे के सपने कैद हैं ,
तुम होंसलों से उड़ो तो आजाद कर के देखूं ।

ये खुवाईशों का कत्ल है सजा जिंदगी देगी,
इजाज़त हो तो तुम्हारे मुकदमें की पैरवी कर के देखूं ।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

वो मुस्लिम मैं हिन्दू

वो कहे,  “या मौला”, मैं  कहूं “हे भगवान”,
वो पूजे  अली , मैं पूजुं श्री राम।

वो अ से अलिफ़, मैं आ से आम,
वो पढ़े क़ुरान, मैं गीता का ज्ञान ।

वो उसे ख़ुदा कहे , मैं उसे कहूं भगवान,
वो जाए  मदीना ,  मैं घूमु चारो धाम,

वो आदाब करे, मेरा हाथ जोड़ प्रणाम,
वो अस्सलाम वालेकुम, मैं कहूं राम  राम राम।

वो रखे रोज़ा, मेरा उपवास हनुमान ,
वो ऊर्दू की शौकीन, मैं हिंदी का विद्वान,

वो मुझे हिन्दू कहे, मैं उसे कहूं मुसलमान,
वो मुझे शुभ दिवाली कहे, मैं कहूं, मुबारक हो रमज़ान।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

पेड़ काट रहें हैं

वो पेड़ काट कर रहे हैं तो अब  फूलों को लगायेंगे,
अगर यहां सिर्फ तितलियों रहेंगी फिर ये परिंदे कहां जाएंगे ?
मुमकिन है, कल तेरा आशियाना महके फूलों की कलियों से,
मगर ये परिंदे तुझे बद्दुवाएं दे कर जाएंगे।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

ये उजाले रात को अंधेरों की क़बा में आते हैं ,

ये उजाले रात को अंधेरों की क़बा में आते हैं ,
मुंह छुपा सूरज से, रोशनी की परछाई बन आते हैं ।

दिन के आंगन में जब तारीकी  फेल जाती है ,
मैं एक चिराग़ जलाता हूं, अंधेरे अपनी ओकात में आ जाते हैं।

ऐ- सूरज मुझे तेरे होने पर कोई ऐतराज़ नहीं , मगर
मेरे जुगनू सुबह होते ही तेरी रोशनी से डर जाते हैं।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

बचपन

हम भी कभी हवा से बातें किया करते थे ,
पतंग हवा में उड़ा,आसमान की बुलदियों को छुआ करते थे,

इस सूरज से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है ,
हम जहां चलते थे, सूरज के साथ – साथ चलते थे ।

जब कभी भी जमीं पर बोझ बन जाते थे ,
बैठ कर अब्बा के शानों पर आसमान में चलते थे,

मैं इस चांद को बचपन से जानता हूं,
बहुत चिड़ता था, जब हम इसे चन्दा मामा कहते थे।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

गुनाह करता कौन है ?

गुनाह होते हैं  हर रोज़ , इन्हें करता कौन है ?
इन मासूम सी तितलियों के पर तोड़ता कौन है ?

कायनात के ज़र्रे – ज़र्रे में ख़ुदा मौजूद है अगर,
फिर इन  कलियों को इस तरह से नोचता कौन है ?

अब हर शहर, हर गांव, हर गली में रहती है हैवानियत,
मगर इन बुतपरस्तीयों में उन्हें ढूंढता कौन है ?

बस मेरी मां, मेरी  हमशीरा महफूज़ रहे ,
दूसरों की बहनों के बारे में सोचता कौन है ?

मैं शर्मिन्दा हूं आदमी जात के होने पर,
अगर यहां सब राम है, तो फिर रावण कौन है?

कहीं वो चांद, कहीं वो रूप की देवी, कहीं संसार की जननी है,
इतना मानते हो तो फिर, उनकी आबरू से खेलत कौन हैं?

हां माना के हम लड़के अच्छे होते हैं, मगर
फिर  लड़कियों की इज्ज़त लूट इन्हें मारता कौन है ?

हम सब यहां धर्म के रखवाने बनकर बैठें हैं ,
फिर माली की हिफाज़त में कलियों को तोड़ता कौन है ?

इंसानियत शब्द है इंसानों का, ये हैवानियत करता कौन है ?
ख़ुदा हर जगह मौजूद है, तो गुनाह करता कौन है ?
गुनाह हर रोज होते हैं, इन्हें करता कौन है  ?

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila