डर लगता है

मैं चिराग़ हूं  तेरे आशियाने का ,
हवा जो चले, तो डर लगता है ।

मैं एक पत्ता तेरे आंगन के दरख़्त का ,
पतझड़ जो आए, तो डर लगता है ।

मैं सिमटा हूआ तेरे बदन की ख़ुशबू में ,
कोई और जो छुए, तो डर लगता है ।

मैं याद हूं तेरे गुजरे ज़माने की ,
तू कहीं भूल ना जाए, तो डर लगता है।

मैं अब भी तेरे दिल में रहता हूं ,
यहां कोई और ना आ जाए,तो डर लगता है ।

तू रूठी है मुझ से कुछ दिनों से,
तू कभी वापिस ना आए, तो डर लगता है ।।
***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

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