आंखों पर चश्मा

वो आंखों पर चश्मा नाक पर गुस्सा रखती है ,
वो घटाओं सी बरसे जब लहरा कर चलती है ।

वो जिन्दा दिल है , वो हसीनाओं में हंसी ,
क़यामत लगती है जब मुस्कुरा कर मिलती है ।

वो खुद में एक करिश्मा जिसके होने पर ताज्जुब हो ,
वो दुनिया कि तारिकी में सूरज की रोशनी सी चमकती है ।

वो घूमने की शौकीन उसे वादियों से मुहब्बत है ,
वो आंखे बंद करे  तो शाम सी ढलती है ।

उसको कुदरत से मुहब्बत , बच्चे बहुत प्यारे हैं ,
उसको सोते देखो तो मासूम बच्ची सी लगती है।

वो तूफानों में पली वो हौसलों से उड़ती है ,
उसे किस्मत से ना कोई गिला,वो किस्मत खुद लिखती है ।

बातें ऐसी की उड़ते परिंदों को नसीहत मिले,
सीने में गुबार है मगर दोस्ती का मतलब समझती है।

उसकी दुश्मनी भी अच्छी है दोस्ती क्या कहिये ?
मिजाज नाजुक हैं उसके मगर अपनों पर मरती है ।

वो पाक रूह है दिल में उसका कुनबा रहता है,
वो अब्बा कि सहजादी सब पर हुकुमत करती है ।

कोई पूछेगा नहीं कि कौन है वो कहां रहती है ?
मेरी हक़ीक़त थी वो, अब मेरे ख़्वाब में रहती है।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

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