ये उजाले रात को अंधेरों की क़बा में आते हैं ,

ये उजाले रात को अंधेरों की क़बा में आते हैं ,
मुंह छुपा सूरज से, रोशनी की परछाई बन आते हैं ।

दिन के आंगन में जब तारीकी  फेल जाती है ,
मैं एक चिराग़ जलाता हूं, अंधेरे अपनी ओकात में आ जाते हैं।

ऐ- सूरज मुझे तेरे होने पर कोई ऐतराज़ नहीं , मगर
मेरे जुगनू सुबह होते ही तेरी रोशनी से डर जाते हैं।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

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