बचपन

हम भी कभी हवा से बातें किया करते थे ,
पतंग हवा में उड़ा,आसमान की बुलदियों को छुआ करते थे,

इस सूरज से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है ,
हम जहां चलते थे, सूरज के साथ – साथ चलते थे ।

जब कभी भी जमीं पर बोझ बन जाते थे ,
बैठ कर अब्बा के शानों पर आसमान में चलते थे,

मैं इस चांद को बचपन से जानता हूं,
बहुत चिड़ता था, जब हम इसे चन्दा मामा कहते थे।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

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