वो और मैं

वो हवा सी बहती है , मैं चिराग़ सा जलता हूं,
वो सुबह सी खिलती है , मैं शाम सा ढलता हूं।

वो चांद की सहेली है , मैं जुगनू सा फिरता हूं ,
वो बारिश की बूंदों सी ,  मैं रेत सा उड़ता हूं ।

वो एक पहेली उलझी सी , मैं उसमें उलझा रहता हूं ,
वो परियों की सरजमीं से, मैं बाशिंदा जमीं का लगता हूं।

वो वक़्त सी चलती है , मैं एक लम्हा सा ठहरता हूं,
वो ख़्वाब में मिलती है , मैं हक़ीक़त में रहता हूं ।

वो किताब है ग़ज़लों की , मैं आख़िरी हर्फ पर लिखा हूं ,
वो अप्सराओं की कहानी है, मैं वो कहानी लिखता हूं।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

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