क्या फ़र्क पड़ता है ?

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Kya fark pdta hai ?

क्या फ़र्क पड़ता है,चाहे आप कितने भी ख्फा हों किसी से?
मगर आज कुदरत रुसवा है हम सभी से।
क्या फर्क पड़ता है कि तेरा मजहब क्या है?
क्योंकि खुदा तो नाराज है हम सभी से।

क्या फ़र्क पड़ता है, आज तुम कैसे दिखते हो?
तेरी मुस्कुराहट कोन देखे, जब चेहरे पर नकाब रखते हो।
क्या फ़र्क पड़ता है,  हवा चाहे कितनी भी साफ हो जाए?
क्या फायदा उस हवा का जिसमें हम  सांस भी ना ले सकते हो ।

क्या फ़र्क पड़ता है तुमने जिदंगी भर कितना कमाया,
क्योंकि वो हाथ  तो गरीब ,का था जिसने तेरा घर बनाया ।
क्या फ़र्क पड़ता है तुमने मंदिर- मस्जिद में कितना दान चड़ाया,
क्योंकि तुमने  खुदा  का घर बनाने वालों को ही आज बेघर बनाया।

ओर क्या फ़र्क पड़ता है लोग तो आज भी ये ही  सोचते है की  बुरा वक़्त है  जो बीत जाएगा,
हां भी मानना है कि आज नहीं तो कल अच्छा वक्त फिर से आयेगा।
मगर जिसने अपना खोया है सिर्फ उसका वक़्त ठहर जाएगा।
क्योंकि उसका वक्त तो आयेगा मगर वो अपना जो चला गया  वो अपना कहां से लायेगा।

सच कहूं तो तेरे घर के बाहर तेरे आंगन में मौत को तेरा भी  इंतजार होगा।
ये वायरस तेरी मौत  के लिए पहले से ज्यादा तैयार  होगा।
वो दिन दूर नहीं जब  तुझे किसी अपने के खोने का गम होगा,
ओर शायद तब सिर्फ पछतावे  के सिवा तेर पास कुछ ना होगा।।

मगर सच  कहूं  तो फर्क पड़ता है अगर तुम वक्त के रहते सम्भल जाओ,
अगर तुम मदद के किए जरूरमंद कि तरफ हाथ बढ़ाओ ।
ओर वक्त कभी भी बेहतर नहीं आयेगा जब तक उसे बेहतर नहीं बनाओ
ये संसार एक परिवार है  अगर इसको अपना घर समझ कर बचाओ।
***आशीष रसीला***

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