क्यूं ?

ऐ मेरे खुदा आखिर मुझे हुआ क्या है?
दिल तो है भरा सा मगर  दिखता खाली सा क्यूं है ?

लगा रोज जमती है महफ़िल हमारे दिल में,
जब आज हम बैठे यहां तो ये महखाना खाली सा क्यूं है ?

कभी तो खुशी झलकती थी इन आंखो में,
आज इन आंखों में दर्द का समंदर सा क्यूं है ?

दिल तो है मेरा अपना ही,
पर आज ये लगता पराया सा क्यूं है ?

गम भी इजाजत मांगता था हमारी जिंदगी में आने कि,
आज पलभर मुस्कुराना भी लगता चंद लम्हों का मेहमान सा क्यूं है ?

वैसे तो रोज मिलता था मैं उनसे,
पर आज मिलता हूं तो लगता बहाना सा क्यूं है ?

कभी ढलता था सूरज तो चांद पर नूर आता था,
आज ये सूरज ही मुझे दिखता पिंघलता सा क्यूं है ?

ये हवाएं भी मुझसे कभी बातें किया करती थी,
आज इन हवाओं में इतना सन्नाटा सा क्यूं है ?

ढोंग लगती थी खुदा की बंदगी मुझे,
आज एक शख्स में ही दिखता मुझे खुदा सा क्यूं है?

आजकल हर रात पूछती मुझ से एक सवाल सा क्यूं है ?
दिन में उसको देखना ही लगता हर सवाल का जवाब सा क्यूं है ?

कभी लिखता था आशीष तो ग़रूर होता था शायरियों में,
आज मेरी कलम से ही टपकता ये लहू सा क्यूं है ?

***आशीष रसीला***

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