कौन कहता है

कौन कहता है कि  तलवारें सिर्फ जंग मैं चलती है,
मैंने उसकी ख़ामोशी को भी सर कलम करते देखा है|
कौन कहता है कि  चाँद बहुत खुबसूरत है
मैंने चाँद को भी उसकी एक अदा के आगे झुकते देखा है|
कौन कहता है कि वक्त कभी रुकता नही,
मैंने उसकी मुस्कुराहट पर वक्त को भी ठहरते देखा है|
कौन कहता है कि हवांए सिर्फ आंधियां लाती है ,
मैंने हवाओ को भी उसके बाल सवारते देखा है|
कौन कहता है कि खुद कुछ भी कर सकता है,
मैंने खुदा को भी उसकी एक झलक के लिए तरसते देखा है|
कौन कहता है कि सूरज सा तेज किसी में भी नही,
मैंने ओरेगी सा तेज उसके चहरे पैर देखा है|
कौन कहता है कि फुल ही सिर्फ खुशबु देते है,
मैंने फूलों को भी उसकी खुशबु से महकते देखा है|
कौन कहता है कि  परिंदे इंसानों की भाषा नही समझते ,
मैंने तितलियों को उससे बात करते देखा है |
कौन कहता है कि तीर सिर्फ कमान से चलते है,
मैंने खुद के दिल को उसकी आंखों के तीरों से घायल होते देखा है|
कौन कहता  है कि जंग सिर्फ वतन के लिए ही लड़ी जाती है,
मैंने उसको पाने की चाहत में खुद को कफन उठाते देखा है|
कौन कहता है कि  वक्त किसी का इंतजार नहीं करता,
मैंने खुद के वक्त को ही उसकी तक में बैठे देखा है|
कौन कहता है कि अपने ही वफादार होते है,
मैंने अपने दिल को ही उसके घर से निकलते देखा है|
कौन कहता है कि सिर्फ कांटे ही जख्म देते है,
मैंने खुद को फूलों से घाव खाते देखा है |
कौन कहता है कि इश्क में इंसान टूट जाता है,
मैंने मांझी को प्यार में पहाड़ चीरते देखा है |
कौन कहता है कि आशीष कभी डरता नही ,
मैंने आशीष को भी उसके डर से कांपते  देखा है ||

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