एक नज़्म मुझ से

एक नज़्म मुझ से रुठ कर गज़ल बनने चली,
एक नदी पानी से रूठ के समंदर बनने चली।।
आज नादानी की सारी हद पार हो गई,
जब रूह मुझ से रुठ कर मेरा जिस्म बनने चली।।
मुझ पर ये आरोप मेरे रहनुमाओं ने लगाया है,
कि मेरी जिंदगी जीते जी ही मेरी मौत बनने चली।।
जिन्दगी अफ़ात में लिखा है पहले से ही,
मौत तो मुय्यान है, अय जिन्दगी तू क्यूं खुदा बनने चली।।
हौंसला क्या चीज है मुझे उस वक़्त मालूम पड़ा,
जब बन्द कमरे एक हवा तूफ़ान बनने चली।।
मैंने वो रात चांद की रोशनी में गुजारी,
जब रात अंधेरे से रूठ कर दिन की सोहबत बनने चली।।
मुझे शक है कि तेरे जिस्म को मेरे इलावा कोई और भी छूता है,
तेरे बदन पर उसकी उंगलियों की परछाई बनने लगी।।
एय ख़ुदा तू आज मुझे इस जिस्म से रिहाई दे दे,
वो आज मेरी आंख में आंख डालकर झुठ तक बोलने लगी।।ASHISH RASILA