अजीब आदमी

अब खुद का खुद में दिल नहीं लगता ,
ज़िन्दगी मुश्किल है मगर, मरना भी आसान नहीं लगता।

सब लतीफे पढ़ चुका हूं मैं,
के वो बच्चा अब मुझ में नहीं हंसता।

दिल भर गया है  हर चीज से मेरा,
कुछ भी करने का दिल नहीं करता।

मैं कुछ ना करके भी थक जाता हूं,
कोई मीलों चल कर भी नहीं थकता।

मैं शायद एक अजीब सा  इंसान हूं,
जो सोया रहता है कोई काम नहीं करता।

सच कहूं तो धरती पर बोझ सा बन गया हूं,
मेरे होने या ना होने से किसी को फ़र्क नहीं पड़ता।

मैं हर रोज सपने बुनता हूं बिस्तर पर,
मगर सुबह कुछ करने को मेरा कदम नहीं बड़ता।

मैं सच कहूं तो बहुत कुछ करना चाहता हूं,
मगर क्या करना है मुझे ये मामुल नहीं पड़ता।

मैं दिल का साफ हूं  और सबकी कद्र करता हूं,
हां वो अलग बात है कि मेरी कद्र कोई नहीं करता।

मैं गुनेहगार हूं अपने मां – बाबा का,
मुझे लगता है कि मैं अच्छा बेटा भी नहीं बन सकता।

सच कहूं तो मैं सच में बहुत बुरा हूं,
खुद में खोया रहता हूं अपनों का ख्याल भी नहीं रखता।

मैं सोचने में ही सारा वक़्त निकाल देता हूं,
मैं कोई भी काम वक़्त पर नहीं करता।

मुझको ले कर सबको शिकायते है,
मगर मैं किसी से कोई शिकायत नहीं करता।

वो मुझे नाकारा, काम चोर कुछ भी कह देते है,
मैं अब खुद की इज्जत भी नहीं करता।

ऐसा लगता है कि जैसे मैं अकेला सा पड़ गया,
दुनिया में भीड़ बहुत मगर मुझे कोई प्यार नहीं करता।

***आशीष रसीला***

हर तरफ शोर

हर तरफ शोर मचा रहे लोग बहरे निकले,
मेरे अपनों के चेहरों पर दुश्मनों के चेहरे निकले ।

समुंदरों ने मुझे प्यासा रख कर ही मार डाला,

सब समुंदरो के पानी खारे निकले।

मैं अंधेरों को मिटाने निकला था घर से,
मगर उनकी चोखट पर ही रोशनियों के पहरे निकले।।

***आशीष रसीला***

चांद को तकता रहा

कल रात आसमां में चांद को एक नज़र तकता रहा,
मैंने उसको  जमीं  का चांद अभी दिखाया नहीं,
लोग तुझे चांद का टुकड़ा कहते है,
मगर अफसोस वो तेरी तरह  मुस्कुराया नहीं।।
***आशीष रसीला***

सज़ा मत दो

अर्ज़ किया है कि,

ये मेरी नज़रों का गुनाह है तुम सज़ा दिल  को मत दो,
तुम मेरी जान ले लो मगर मुझे इतना प्यार मत दो ।
मैं टूट कर सितारे से एक जुगनू बन गया  हूं,
खुदा के लिए तुम मुझे चांद बनने कि हवा मत दो।।
***आशीष रसीला***

नया दौर

तुम बाज़ार निकले हो तो निगाहें साफ रखना,
ज़माने में नया दस्तूर चला है चेहरे पर नकाब रखना।
चाहे माशूक हो या दोस्त कोई पुराना,
ये नया दौर है तुम  मिलने में ज़रा फासला रखना।।
***आशीष रसीला***

क्या फ़र्क पड़ता है ?

Youtube link for Heart touching Poetry.

Kya fark pdta hai ?

क्या फ़र्क पड़ता है,चाहे आप कितने भी ख्फा हों किसी से?
मगर आज कुदरत रुसवा है हम सभी से।
क्या फर्क पड़ता है कि तेरा मजहब क्या है?
क्योंकि खुदा तो नाराज है हम सभी से।

क्या फ़र्क पड़ता है, आज तुम कैसे दिखते हो?
तेरी मुस्कुराहट कोन देखे, जब चेहरे पर नकाब रखते हो।
क्या फ़र्क पड़ता है,  हवा चाहे कितनी भी साफ हो जाए?
क्या फायदा उस हवा का जिसमें हम  सांस भी ना ले सकते हो ।

क्या फ़र्क पड़ता है तुमने जिदंगी भर कितना कमाया,
क्योंकि वो हाथ  तो गरीब ,का था जिसने तेरा घर बनाया ।
क्या फ़र्क पड़ता है तुमने मंदिर- मस्जिद में कितना दान चड़ाया,
क्योंकि तुमने  खुदा  का घर बनाने वालों को ही आज बेघर बनाया।

ओर क्या फ़र्क पड़ता है लोग तो आज भी ये ही  सोचते है की  बुरा वक़्त है  जो बीत जाएगा,
हां भी मानना है कि आज नहीं तो कल अच्छा वक्त फिर से आयेगा।
मगर जिसने अपना खोया है सिर्फ उसका वक़्त ठहर जाएगा।
क्योंकि उसका वक्त तो आयेगा मगर वो अपना जो चला गया  वो अपना कहां से लायेगा।

सच कहूं तो तेरे घर के बाहर तेरे आंगन में मौत को तेरा भी  इंतजार होगा।
ये वायरस तेरी मौत  के लिए पहले से ज्यादा तैयार  होगा।
वो दिन दूर नहीं जब  तुझे किसी अपने के खोने का गम होगा,
ओर शायद तब सिर्फ पछतावे  के सिवा तेर पास कुछ ना होगा।।

मगर सच  कहूं  तो फर्क पड़ता है अगर तुम वक्त के रहते सम्भल जाओ,
अगर तुम मदद के किए जरूरमंद कि तरफ हाथ बढ़ाओ ।
ओर वक्त कभी भी बेहतर नहीं आयेगा जब तक उसे बेहतर नहीं बनाओ
ये संसार एक परिवार है  अगर इसको अपना घर समझ कर बचाओ।
***आशीष रसीला***