वो मुस्लिम मैं हिन्दू

वो कहे,  “या मौला”, मैं  कहूं “हे भगवान”,
वो पूजे  अली , मैं पूजुं श्री राम।

वो अ से अलिफ़, मैं आ से आम,
वो पढ़े क़ुरान, मैं गीता का ज्ञान ।

वो उसे ख़ुदा कहे , मैं उसे कहूं भगवान,
वो जाए  मदीना ,  मैं घूमु चारो धाम,

वो आदाब करे, मेरा हाथ जोड़ प्रणाम,
वो अस्सलाम वालेकुम, मैं कहूं राम  राम राम।

वो रखे रोज़ा, मेरा उपवास हनुमान ,
वो ऊर्दू की शौकीन, मैं हिंदी का विद्वान,

वो मुझे हिन्दू कहे, मैं उसे कहूं मुसलमान,
वो मुझे शुभ दिवाली कहे, मैं कहूं, मुबारक हो रमज़ान।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

पेड़ काट रहें हैं

वो पेड़ काट कर रहे हैं तो अब  फूलों को लगायेंगे,
अगर यहां सिर्फ तितलियों रहेंगी फिर ये परिंदे कहां जाएंगे ?
मुमकिन है, कल तेरा आशियाना महके फूलों की कलियों से,
मगर ये परिंदे तुझे बद्दुवाएं दे कर जाएंगे।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

ये उजाले रात को अंधेरों की क़बा में आते हैं ,

ये उजाले रात को अंधेरों की क़बा में आते हैं ,
मुंह छुपा सूरज से, रोशनी की परछाई बन आते हैं ।

दिन के आंगन में जब तारीकी  फेल जाती है ,
मैं एक चिराग़ जलाता हूं, अंधेरे अपनी ओकात में आ जाते हैं।

ऐ- सूरज मुझे तेरे होने पर कोई ऐतराज़ नहीं , मगर
मेरे जुगनू सुबह होते ही तेरी रोशनी से डर जाते हैं।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

बचपन

हम भी कभी हवा से बातें किया करते थे ,
पतंग हवा में उड़ा,आसमान की बुलदियों को छुआ करते थे,

इस सूरज से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है ,
हम जहां चलते थे, सूरज के साथ – साथ चलते थे ।

जब कभी भी जमीं पर बोझ बन जाते थे ,
बैठ कर अब्बा के शानों पर आसमान में चलते थे,

मैं इस चांद को बचपन से जानता हूं,
बहुत चिड़ता था, जब हम इसे चन्दा मामा कहते थे।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

गुनाह करता कौन है ?

गुनाह होते हैं  हर रोज़ , इन्हें करता कौन है ?
इन मासूम सी तितलियों के पर तोड़ता कौन है ?

कायनात के ज़र्रे – ज़र्रे में ख़ुदा मौजूद है अगर,
फिर इन  कलियों को इस तरह से नोचता कौन है ?

अब हर शहर, हर गांव, हर गली में रहती है हैवानियत,
मगर इन बुतपरस्तीयों में उन्हें ढूंढता कौन है ?

बस मेरी मां, मेरी  हमशीरा महफूज़ रहे ,
दूसरों की बहनों के बारे में सोचता कौन है ?

मैं शर्मिन्दा हूं आदमी जात के होने पर,
अगर यहां सब राम है, तो फिर रावण कौन है?

कहीं वो चांद, कहीं वो रूप की देवी, कहीं संसार की जननी है,
इतना मानते हो तो फिर, उनकी आबरू से खेलत कौन हैं?

हां माना के हम लड़के अच्छे होते हैं, मगर
फिर  लड़कियों की इज्ज़त लूट इन्हें मारता कौन है ?

हम सब यहां धर्म के रखवाने बनकर बैठें हैं ,
फिर माली की हिफाज़त में कलियों को तोड़ता कौन है ?

इंसानियत शब्द है इंसानों का, ये हैवानियत करता कौन है ?
ख़ुदा हर जगह मौजूद है, तो गुनाह करता कौन है ?
गुनाह हर रोज होते हैं, इन्हें करता कौन है  ?

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

मौत

आंसू रूठ गए हैं,अब वे उनकी आंखों में नहीं रहते ,
अब वे ख़ामोश रहते हैं , लफ्ज़ अब उनकी जुबां में नहीं रहते।

वो सब कुछ भूल बैठें है,अब हमें याद भी नहीं करते,
अब वो पत्थर दिल हो गए हैं, इश्क़ की बातें नहीं करते ।

वो मुस्कुराते तक नहीं हैं , चेहरे पर हंसी के फरिश्ते नहीं रहते,
पलकें आंखों का पहरा नहीं देती, आंखो में अब ख़्वाब नहीं रहते ।

भूख जिस्म से गायब है , अब खाने में कोई फ़रमाइश नहीं करते,
दिल धड़कना भूल गया है , सांस लेने के लिए मछली सा नहीं तड़पते ।

रूह अपनी मंजिल पर आ पहुंची है, प्राण जिस्म में नहीं रहते,
कल उनकी शादी है,  मगर दूल्हे सफेद लिबास में नहीं रहते।

चार लोग उनको कंधे पर लायेंगे, जनाजे घोड़ी पर नहीं चलते ,
बाराती भी साथ होंगे, मगर नाचने के लिए आगे नहीं चलते।

जब दुल्हन मौत बनी हो , तो दूल्हे को घर नहीं रखते ,
ये शादी सच है दुनिया का, डोली बिछड़ने पर रोया नहीं करते।।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

हुस्न बैठा है

“मेरा शायराना सफर”
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हुस्न बैठा है राह में तारीफों का भिखारी बनकर ,
सादगी रहती है सवरने वालों की दुश्वारी बनकर ।
अमीरी दबी रहती है सोने – चांदी के बोझ नीचे,
ग़रीबी चलती है शोक से नीम का तिनका पहनकर ।।
***आशीष रसीला***

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila

वो निकलते हैं जब शहर

वो निकलते हैं जब शहर, तो शहर ठहर कर देखता है,
जवानों की तो छोड़िये, बुज़ुर्ग भी दिल थाम कर बैठता है ।

हवाऐं भी ना जाने क्यूं उसे छूने को आती हैं ?
ये बादल भी उसे छूने के खातिर बरस कर देखता है ।

सितारे बाम – ऐ – फलक से  उतर जाते हैं ,
चांद भी उसको खिड़की से छुप कर देखता है ।

उनका हुस्न उनकी जवानी का पहरा देता है ,
के ख़ुदा भी उसकी खूबसूरती को पलट कर देखता है

हीरे – मोती उन पर सजने की फ़रियाद करते हैं ,
के आईना भी खुद उन्हें सवर कर देखता है।।

यूं तो हम भी देखते है रोक हसीनाओं को लेकिन,
हमारा दिल भी ना जाने क्यूं उन्हीं पर ठहर कर देखता है। ।

***आशीष रसीला***

Ashish Rasila